
वंदेभारतलाइवटीव न्युज, मंगलवार 10 फरवरी 2026
——> प्राप्त हुई जानकारी के अनुसार सोशल मीडिया प्लेटफार्मस जैसे कि एक्स, यूट्यूब, स्नेपचैट , फेसबुक आदि को अबसे अपने प्लेटफार्मस पर शेयर किए जाने वाले एआई आधारित कंटेंट पर लेबल लगाना जरूरी होगा, और इसके साथ ही डीपफेक वीडियो और फोटो को भी तीन घंटे के अंदर हटाना होगा। प्राप्त हुई जानकारी के अनुसार आज मंगलवार 10 फरवरी 2026 को इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय भारत सरकार ने आदेश जारी किया है। इसमें आईटी नियम 2021 में परिवर्तन किया गया है। प्राप्त जानकारी अनुसार परिवर्तित नियम 20फरवरी 2026 से लागू किए जायेंगे। इसका ड्राफ्ट भी भारत सरकार ने 22 अक्टूबर 2025 को जारी कर दिया था। जानकारी अनुसार नये नियम डीपफेक और एआई से बने हुए कंटेंट को लेबल और ट्रेस करने के लिए बनाए गए हैं। इसका मतलब है कि अबसे एआई आधारित कंटेंट में यह साफ लिखना होगा कि रह कंटेंट असली नहीं है, एआई वाला कंटेंट है। इससे गलतफहमी और चुनावी धांधली जैसी समस्याओं पर रोक लगने की उम्मीद है। नये नियम 3(3)के अंतर्गत जो भी सोशल मीडिया प्लेटफार्म एआई कंटेंट जैसी सिंथेटिकली जनरेटेड इंफॉर्मेशन क्रियेट करने देगा, उसे ऐसे ही कंटेंट पर प्राॅमिनेट लेबल लगाना आवश्यक होगा। परमानेंट यूनीक मेटाडेटा , आईडेंटिफायर एम्बेड भी करना जरूरी होगा। जानकारी अनुसार यह लेबल विजुअल मे कम से कम 10% तक का एरिया कवर करेगा या वीडियो में पहले 10% समय सुनाई देगा। मेटाडेटा को कोई भी चेंज , हाइड या डिलीट नहीं कर सकेगा। सोशल मीडिया प्लेटफार्मस को तकनीकि रूप अपनाने पड़ेंगे, जिससे कि अपलोड होने से पहले ही यह चेक किया जा सके कि यह असली है या फिर एआई वाला है। सोशल मीडिया कंपनियां अब से एआई या उसके मेटाडेटा को हटाने या फिर छिपाने की अनुमति नहीं दे सकती, एकबार लेबल लग जाने के बाद उसे वैसे ही रखना होगा। भारत सरकार ने सोशल मीडिया कंपनियों को यह आदेश दिया कि वे ऐसे ऑटोमेटेड टूल्स उपयोग करें जो कि एआई के माध्यम से बनाए गए गैर कानूनी या अश्लील, धोखाधड़ी वाले कंटेंट को रोक सकें। सोशल मीडिया कंपनियों को हर तीन महिने में कम से कम एक बार अपने उपभोक्ताओ को चेतावनी भी देनी होगी, उन्हें यह भी बताना होगा कि यदि उन्होनें एआई का किसी प्रकार से गलत उपयोग किया या नियमों का उल्लंघन किया तो उन्हें इसके लिए सजा या जुर्माना भी हो सकता है। सरकार के इस फैसले से यूजर्स अब फेक कंटेंट को आसानी के साथ पहचान सकेंगे, और इससे गलतफ़हमी भी कम होगी।





